मेरे साथ जब मैं खुद खड़ा होता हूँ,
तब मैं क़यामत के हर तूफ़ान से बड़ा होता हूँ।

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एक इसी उसूल पर गुजारी है जिंदगी मैंने,
जिसको अपना माना उसे कभी परखा नहीं।

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वही हमरे काबिल न था दोस्तों,
वरना मोहब्बत की क्या औकात जो हमे ठुकरा दे।

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तू मेरे साथ नही चल कोई बात नही,
लेकिन यह बंदा तेरे लिये आँसू बहाए ऐसी तेरी औकात नही।

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दिल से अगर दे तो नफरत भी कबूल है,
खैरात में तो तेरी मोहब्बत भी मंजूर नहीं।

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काबिल नजरो के लिये हम जान दे दे पर,
कोई गुरुर से देखे ये हमे मंजूर नही।

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हमारे इश्क ने मशहूर कर दिया तुझे ऐ बेवफा,
नहीं तो तू सुर्खियों में रहे, इतनी औकात नहीं।

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न-खुश है हम से इस बात पर ज़माना,
शामिल नहीं है हमारी फ़ितरत में सर झुकाना।

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